Building & Construction

प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर में अंतर

प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर में बड़ा मजेदार फर्क होता है। सोचो, प्रोजेक्ट इंजीनियर तो पूरे प्रोजेक्ट का मास्टर प्लानर होता है, जो बजट संभाले, टाइम लाइन बनाए और टीम को सही दिशा दिखाए। वो जैसे हमारे घर का मुख्य सरदार! वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर सीधे साइट पर होता है, उपकरणों से लड़ता है, काम की क्वालिटी पर नजर रखता है और छोटी-छोटी तकनीकी दिक्कतें सुलझाता रहता है। प्रोजेक्ट इंजीनियर ऊंट के मुंह में जीरा ढूंढता हो तो कंस्ट्रक्शन वाला असली मैदान का योद्धा बनकर ठेठ हलचल करता रहता है। दोनों मिलकर ही काम सफल बनाते हैं वरना पूरा मसाला अधूरा रह जाता!

Table of Contents

  1. प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ
  2. कार्य क्षेत्र में प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर का फर्क
  3. दोनों इंजीनियरों के लिए जरूरी कौशल और विशेषज्ञता
  4. निर्णय लेने में प्रोजेक्ट और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की भूमिका
  5. नया बिल्डिंग प्रोजेक्ट: प्रोजेक्ट और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर कैसे काम करते हैं
  6. DISQAS.com क्या है और यह कैसे काम करता है?
  7. DISQAS.com पर विशेषज्ञों से वीडियो कॉल कैसे बुक करें?
  8. DISQAS.com के फायदे: घर बैठे विशेषज्ञों से सलाह लेने का मज़ा
  9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों
    9.1. प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर का काम एक जैसा तो नहीं होता न? अगर लगता तो सब मिलके एक ही काम कर लेते?
    9.2. तो क्या प्रोजेक्ट इंजीनियर फील्ड पर कम और ऑफिस में ज्यादा रहकर काम करते हैं?
    9.3. क्या दोनों इंजीनियरों को एक जैसे इंजीनियरिंग डिग्री चाहिए होती है?
    9.4. अगर बहानेबाजी करनी हो तो कौन सीनियर इंजीनियर ज्यादा बेहतर होता है?
    9.5. क्या दोनों की नौकरियों में बढ़ोतरी का रास्ता भी अलग होता है?

प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ

प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर काम करते हुए फोटो

प्रोजेक्ट इंजीनियर पूरे प्रोजेक्ट की योजना बनाने वाला मास्टरशेफ है, जो हर स्टेप को ध्यान से पकाता है ताकि स्वादिष्ट डिश बने। वह बजट, समयसीमा और संसाधनों का सुपरवाइजर होता है, जैसे पार्टी में डीजे और डांसर्स को सिंक में रखता हो। तकनीकी सलाह देकर टीमों के बीच तालमेल बिठाता है और प्रोजेक्ट की प्रगति पर नजर रखता है, जैसे कोई मैच का रेफरी जो गलती होते ही तुरन्त फैंसला करता है। वहीं, कंस्ट्रक्शन इंजीनियर साइट पर जाकर असली हीरो बनता है, काम की गुणवत्ता, सुरक्षा, मशीनरी और सामग्री का निरीक्षण करता है, यानि जैसे जादूगर अपनी छड़ी से हर समस्या को हल करता हो। वह प्रोजेक्ट इंजीनियर के निर्देशानुसार साइट पर काम करवाता है, जैसे कमांडर और सिपाही की जोड़ी, और सुनिश्चित करता है कि सब काम सही दिशा में और समय पर पूरा हो। दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग जरूर हैं, पर एक-दूसरे के बिना जैसे चाय में शक्कर, जरूरी और मजेदार, जो मिलकर प्रोजेक्ट को सफल बनाते हैं।

विशेषता प्रोजेक्ट इंजीनियर कंस्ट्रक्शन इंजीनियर
प्रमुख कार्य पूरे प्रोजेक्ट की योजना, समन्वय और प्रबंधन करता है, जैसे मास्टरशेफ जो हर रेसिपी स्टेप को बखूबी समझता है। साइट पर सक्रिय रूप से काम करता है, जैसे हीरो ऑफ द प्लॉट, निर्माण की क्वालिटी और सुरक्षा देखता है।
जिम्मेदारी बजट, टाइमलाइन और संसाधनों का सुपरवाइजर की तरह ध्यान रखता है। मशीनरी और सामग्री का निरीक्षण करता है ताकि सब कुछ फिट-फिट चले।
तकनीकी भूमिका टीमों के बीच तालमेल बिठाता है, जैसे पार्टी में डीजे और डांसर्स का सिंक। निर्माण के दौरान आने वाली तकनीकी समस्याओं को जादूगर की छड़ी से हल करता है।
निर्णय लेना प्रोजेक्ट की प्रगति की निगरानी करता है और तुरन्त निर्णय लेता है। साइट पर काम की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
अनुपालन प्रोजेक्ट इंजीनियर के निर्देशानुसार साइट पर काम करवाता है, यानी कमांडर और सिपाही की जोड़ी। प्रोजेक्ट इंजीनियर के निर्देशों के अनुसार साइट पर कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
महत्व पूरे प्रोजेक्ट को सफल बनाने का मास्टर प्लानर। साइट पर काम सही दिशा में और समय पर पूरा करने वाला असली हीरो।

कार्य क्षेत्र में प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर का फर्क

अगर प्रोजेक्ट इंजीनियर को क्रिकेट टीम का कप्तान मानें, तो कंस्ट्रक्शन इंजीनियर वही विकेटकीपर हैं जो मैदान पर हर गेंद पर नज़र रखते हैं। प्रोजेक्ट इंजीनियर पूरे प्रोजेक्ट की योजना बनाते हैं, बजट देखते हैं, टीमों को मैनेज करते हैं और बड़े फैसले लेते हैं। मतलब, वे ऑफिस और साइट दोनों जगह सक्रिय रहते हैं, जैसे कप्तान जो प्लान बनाता है और रणनीति तय करता है। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर साइट पर रहते हैं, जैसे विकेटकीपर जो हर गेंद का सामना करता है, तकनीकी समस्याओं को तुरंत सुलझाते हैं ताकि काम रुके नहीं। वे साइट की मशीनरी, सामग्री, सुरक्षा और गुणवत्ता पर नजर रखते हैं। प्रोजेक्ट इंजीनियर रणनीति बनाते हैं और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर उसे फील्ड में लागू करते हैं। यह फर्क ऐसा है जैसे एक पैंट की दो जेबें, दोनों जरूरी हैं, दोनों अलग काम करती हैं। बिना कप्तान के टीम दिशा खो देगी, और बिना विकेटकीपर के विकेट जल्दी गिरेंगे। इस तरह, दोनों के कार्य क्षेत्र में फर्क उनकी टीम को मजबूत और सफल बनाता है।

दोनों इंजीनियरों के लिए जरूरी कौशल और विशेषज्ञता

इंजीनियरिंग कौशल और विशेषज्ञता का चित्र

प्रोजेक्ट इंजीनियर वो शख्स होता है जो योजना बनाने में माहिर होता है, बजट की गुत्थियाँ सुलझाता है और टीम को ऐसे मैनेज करता है जैसे क्रिकेट टीम का कप्तान। तकनीकी ज्ञान तो उसकी बुनियाद है, लेकिन लोगों की बात समझना और उन्हें मनाना भी उसकी कला है। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर को तो साइट पर ही सुपरहीरो समझो, जो हर तकनीकी उलझन को मिनटों में सुलझा देता है। उसे साइट मैनेजमेंट, निर्माण तकनीक और सुरक्षा नियमों का ऐसा ज्ञान होना चाहिए कि कोई भी समस्या उसे देखकर घबराए नहीं। प्रोजेक्ट इंजीनियर को रणनीतिक सोच की जरूरत होती है ताकि वह प्रोजेक्ट की लंबी दौड़ में टिक सके, जबकि कंस्ट्रक्शन इंजीनियर को हाथों का जादूगर होना चाहिए, जो मेहनती और व्यावहारिक हो। दोनों के बीच संवाद कौशल की अहमियत इतनी है कि अगर ये भाषा नहीं समझेंगे तो प्रोजेक्ट इंजीनियर को कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की भाषा सीखनी पड़ेगी, वरना प्रोजेक्ट की टाइमलाइन बन जाएगी बनारस की सवारी। समय प्रबंधन दोनों के लिए उतना ही जरूरी है जितना चाय के बिना सुबह, और हाँ, दोनों को टीमवर्क में विश्वास करना चाहिए, क्योंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। तकनीकी विशेषज्ञता अलग हो सकती है, पर दोनों का तालमेल ही प्रोजेक्ट को सफल बनाता है।

निर्णय लेने में प्रोजेक्ट और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की भूमिका

प्रोजेक्ट इंजीनियर को सोचने में ऐसा समझो जैसे शतरंज का मास्टर अगली चाल पर दिमाग लगाए, वो बजट, टाइमलाइन और संसाधनों के बड़े-बड़े फैसले करता है जो पूरे प्रोजेक्ट की दिशा तय करते हैं। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर साइट पर ऐसा ही है जैसे अचानक सड़क पर गड्ढा आ जाए तो तुरन्त बचाव की चाल चलनी पड़े, वो तुरंत तकनीकी समस्याओं का समाधान निकालता है ताकि काम रुक न जाए। प्रोजेक्ट इंजीनियर का निर्णय दूर की सोच और व्यापक प्रभाव वाला होता है, जबकि कंस्ट्रक्शन इंजीनियर के फैसले साइट की रोजमर्रा की गतिविधियों को सुचारू बनाते हैं। दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन जैसे चाय में अदरक और इलायची का मेल, वैसे ही इन दोनों के निर्णय मिलकर प्रोजेक्ट की सफलता की चाबी बनते हैं। अगर इनके बीच संवाद अच्छा रहा तो कोई भी समस्या बड़ी नहीं लगती, वरना समझो जैसे बिना नमक की दाल, कुछ अधूरा सा। इसलिए प्रोजेक्ट इंजीनियर को रणनीतिक सोच रखनी होती है और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर को तत्कालीन हालात से निपटना पड़ता है, दोनों की भूमिका पूरी तरह अलग लेकिन एक-दूसरे के लिए जरूरी पूरक है।

नया बिल्डिंग प्रोजेक्ट: प्रोजेक्ट और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर कैसे काम करते हैं

जब नया बिल्डिंग प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर की जोड़ी एकदम सुपरहिट कॉम्बिनेशन बन जाती है, जैसे चाय और बिस्किट। प्रोजेक्ट इंजीनियर सबसे पहले डिजाइन, बजट और टाइमलाइन सेट करता है, यानी योजना बनाता है कि कब क्या करना है, कितना खर्च करना है और कितना समय लगेगा। वह अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल बैठाता है, बिलकुल एक निर्देशक की तरह, जो सबको सही दिशा में ले जाता है। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर साइट पर पहुंचकर काम की गुणवत्ता, सुरक्षा और निर्माण सामग्री की जांच करता है ताकि सबकुछ मस्त और सही चले। जब साइट पर कोई दिक्कत आती है, तो कंस्ट्रक्शन इंजीनियर तुरंत उसे सुलझाता है, जैसे बिजली चली जाए तो फ्यूज बदलना। प्रोजेक्ट इंजीनियर समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट देखता रहता है और जरूरत पड़े तो बदलाव करता है। दोनों एक-दूसरे को अपडेट देते रहते हैं ताकि कोई गड़बड़ न हो और प्रोजेक्ट समय पर और बजट में पूरा हो जाए। अगर ये दोनों समझदारी से काम करें, तो प्रोजेक्ट चमक उठता है, वरना भट्ठी में भट्ठा लग जाता है! इस मजेदार तालमेल के बिना नया बिल्डिंग प्रोजेक्ट अधूरा ही रहता है।

DISQAS.com क्या है और यह कैसे काम करता है?

सोचिए जब आपको किसी ज्योतिषी या आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह लेनी हो, लेकिन ट्रैफिक, भीड़-भाड़ और लंबी लाइनों से बचना हो, तो DISQAS.com आपके लिए सुपरहीरो की तरह आता है! यह एक ऑनलाइन मंच है जहाँ आप घर बैठे अपने फोन या कंप्यूटर के जरिए सीधे वीडियो कॉल पर विशेषज्ञों से बात कर सकते हैं। बस जैसे दोस्त से चैट करते हो, वैसे ही यहाँ ज्योतिषी, योग गुरु, वास्तु विशेषज्ञ और भी कई प्रोफेशनल्स से सवाल पूछ सकते हैं। खास बात यह है कि DISQAS.com पर मौजूद हर विशेषज्ञ की विश्वसनीयता पर बड़ा ध्यान दिया गया है, मतलब कोई फेक बाबा या नकली डॉक्टर नहीं! अपॉइंटमेंट बुक करना भी इतना आसान है जैसे ऑनलाइन मूवी टिकट लेना, बस अपनी पसंद का समय चुनो और हो गया कनेक्शन। और तो और, यह प्लेटफॉर्म पूरी तरह से आपकी प्राइवेसी का ख्याल रखता है, तो आपकी बातें सिर्फ आपके और एक्सपर्ट के बीच ही रहती हैं। कहीं भी, कभी भी, जब मन करें, विशेषज्ञ की सलाह पाने के लिए बस एक क्लिक की दूरी पर DISQAS.com है। तो अगली बार जब आपकी कोई भी समस्या हो, चाहे वास्तु हो या योग, बाहर निकलने की जरूरत नहीं, बस वीडियो कॉल करो और अपने घर की कुर्सी पर बैठकर ही समाधान पाओ!

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DISQAS.com पर विशेषज्ञों से वीडियो कॉल कैसे बुक करें?

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DISQAS.com के फायदे: घर बैठे विशेषज्ञों से सलाह लेने का मज़ा

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

1. प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर का काम एक जैसा तो नहीं होता न? अगर लगता तो सब मिलके एक ही काम कर लेते?

हां, दोनों का नाम सुनते ही लगता है कि आराम से कैप वाले इंजीनियर हैं, पर नहीं! प्रोजेक्ट इंजीनियर प्लानिंग और टीम मैनेजमेंट के सुपरहीरो हैं, जबकि कंस्ट्रक्शन इंजीनियर मालिक की बिल्डिंग के असली बिल्डर, जो मोजेदार हेलमेट पहनकर फील्ड में धूल उड़ाते हैं। मतलब, एक दिमाग से खेलता है, दूसरा हार्ड-हैट पहनकर फील्ड में!

2. तो क्या प्रोजेक्ट इंजीनियर फील्ड पर कम और ऑफिस में ज्यादा रहकर काम करते हैं?

बिल्कुल! प्रोजेक्ट इंजीनियर ऑफिस में बैठकर जैसा ड्रामा सेट करता है, वैसा ये प्लानिंग में करती है। वो चार्ट बनाते हैं, मीटिंग करते हैं, और सबको समझाते हैं कि काम कब, कैसे और कितना होगा। दूसरी तरफ, कंस्ट्रक्शन इंजीनियर पसीने से तरबतर,现场 (फील्ड) में जाकर जमीन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ को संभालते हैं। मतलब, घर तो ऑफिस का लेकिन असली मस्ती मिक्सर मशीन के करीब होती है!

3. क्या दोनों इंजीनियरों को एक जैसे इंजीनियरिंग डिग्री चाहिए होती है?

हाँ भई, दोनों को बीटेक या डिप्लोमा चाहिए होता है, लेकिन मज़े की बात ये कि प्रोजेक्ट इंजीनियर को थोड़ी पैनी सोच, टीम को मनाने की कला और रिपोर्ट बनाने का जादू आना चाहिए, जबकि कंस्ट्रक्शन इंजीनियर को मजदूरों की भाषा, लॉजिक समझने की ताकत और कब मशीन को कहो चलो, कब स्टॉप करो की आवाज़ समझनी होती है। दिमाग तो दोनों का चाहिए, पर ऑन-फील्ड एक्सपर्ट होने के ट्विस्ट अलग होते हैं।

4. अगर बहानेबाजी करनी हो तो कौन सीनियर इंजीनियर ज्यादा बेहतर होता है?

ओह ये तो मजेदार मैच है! प्रोजेक्ट इंजीनियर बहानेबाजी में मास्टर, क्यूंकि वो हर दिन एक नया प्लान बनाता है और कहता है ‘कल से ज़्यादा मेहनत करेंगे’। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर कहता है, ‘भाई ये जो मशीन खराब है, वही वजह थी’। मतलब, एक हाथ में चार्ट और दूसरी में कड़ी मेहनत का बहाना! दोनों इंजीनियर मिलकर टीम के लिए बहाने के अलग-अलग मैगा-बटन हैं।

5. क्या दोनों की नौकरियों में बढ़ोतरी का रास्ता भी अलग होता है?

जी बिल्कुल। प्रोजेक्ट इंजीनियर ऑफिस के टियर पर चढ़ते-चढ़ते ‘मैनेजर’ और फिर ‘डायरेक्टर’ बन सकता है, यानी कुर्सी की शान बढ़ती है। वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर जो फील्ड में रोज़ तगड़ी मेहनत करता है, वो सीनियर कंस्ट्रक्शन इंजीनियर या साइट मैनेजर बनकर असली धरती का राजा कहलाता है। मतलब, एक चमक-दमक वाली कुर्सी, दूसरा मस्त हेलमेट और काम का कमाल। दोनों की अपनी दुनिया है, दोनों अपने तड़के के साथ!

TL;DR प्रोजेक्ट इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन इंजीनियर में फर्क वैसा ही है जैसे प्लान बनाने वाला प्लान और उसे जमीन पर उतारने वाला सुपरहीरो! प्रोजेक्ट इंजीनियर पूरे प्रोजेक्ट को बजट, टाइम, और प्लानिंग में यकीन दिलाता है, वहीं कंस्ट्रक्शन इंजीनियर साइट पर जाकर गाड़ी, सामग्री और काम की क्वालिटी संभालता है। कौशल की बात करें तो पहले वाले को पेज पर बैठकर रणनीति बनाने का हुनर चाहिए, दूसरे को हेलमेट पहनकर现场 की मुश्किलें हल करने का जादू। डिसीकैस.com भी है, जो घर बैठे एक्सपर्ट्स से वीडियो कॉल करवा कर आपको ज्योतिष, आयुर्वेद, योग जैसी सलाह देता है, ताकि आपकी परेशानी भी हल हो और तकनीकी ज्ञान भी! तो कुल मिला के, एक थियेटर का डायरेक्टर और एक एक्टर समझो दोनों, बिना एक दूसरे के मज़ा अधूरा है।